सतना के घने जंगलों में स्थित धारकुंडी आश्रम अपनी आध्यात्मिक शांति और महाभारत कालीन संबंधों के लिए प्रसिद्ध है। जानें स्वामी सच्चिदानंद जी और अघमर्षण कुंड का रहस्य।

सतना। स्टार समाचार वेब
विंध्य की पहाड़ियों और घने जंगलों के आंचल में बसा 'धारकुंडी आश्रम' केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि अध्यात्म और कुदरत के मेल का एक अद्भुत केंद्र है। सतना जिला मुख्यालय से करीब 70 किलोमीटर दूर स्थित यह आश्रम अपनी रहस्यमयी उत्पत्ति, महाभारत कालीन इतिहास और अनुशासन के लिए देश भर में विख्यात है।
शेर की गुफा और स्वामी जी का आगमन
धारकुंडी आश्रम की स्थापना की कहानी किसी चमत्कार से कम नहीं है। आश्रम के सेवादार राजकरण बाबा, जो पिछले 34 वर्षों से यहाँ सेवा दे रहे हैं, बताते हैं कि 22 नवंबर 1956 को स्वामी परमहंस सच्चिदानंद जी महाराज का इस बीहड़ जंगल में आगमन हुआ था। उस समय यहाँ केवल एक भयानक गुफा थी, जिसमें एक खूंखार शेर रहा करता था।
कहा जाता है कि जब स्वामी जी ने उस गुफा में अपना डेरा जमाया, तो शेर ने बिना किसी संघर्ष के स्वतः वह स्थान छोड़ दिया। स्वामी जी ने कंद-मूल खाकर वर्षों तक यहाँ कठिन तपस्या की। उनकी दिव्य आभा से प्रभावित होकर आसपास के गांवों के लोग धीरे-धीरे उनसे जुड़ने लगे।
महाभारत काल और यक्ष-युधिष्ठिर संवाद का संबंध
धारकुंडी का ऐतिहासिक महत्व द्वापर युग से भी जुड़ा है। आश्रम के समीप स्थित अघमर्षण कुंड को लेकर मान्यता है कि यह वही स्थान है जहाँ महाभारत काल में यक्ष और धर्मराज युधिष्ठिर के बीच प्रसिद्ध संवाद हुआ था। स्थानीय लोककथाओं के अनुसार, यह गुफा प्राचीन काल में वेद श्यांगक ऋषि की तपोस्थली भी रही है, जिसके कारण यहाँ आज भी ध्यान और साधना करने पर विशेष मानसिक शांति की अनुभूति होती है।
अनुशासन और सेवा की अनूठी मिसाल
धारकुंडी आश्रम की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ की भोजन व्यवस्था है। यहाँ आने वाला हर श्रद्धालु एक अनोखी परंपरा का हिस्सा बनता है। प्रतिदिन दोपहर 12:30 से 1:00 बजे के बीच भंडारा होता है। यहाँ कोई विशेष सेवक नहीं होता, बल्कि भक्त ही एक-दूसरे को आदरपूर्वक भोजन परोसते हैं।भोजन के पश्चात प्रत्येक व्यक्ति अपनी थाली स्वयं धोकर निर्धारित स्थान पर रखता है। यह व्यवस्था अहंकार को मिटाने और सेवा भाव जगाने के उद्देश्य से दशकों से चली आ रही है।
हनुमान जी का स्वप्न और 5 करोड़ राम नाम का जाप
स्वामी सच्चिदानंद जी महाराज के जीवन से जुड़े कई अनकहे पहलू हैं। कहा जाता है कि युवावस्था में वह सेना में रह चुके थे, जिसका आभास उनकी कार्यशैली से होता था। जानकी कुंड चित्रकूट में प्रवास के दौरान उन्हें हनुमान जी ने स्वप्न में 5 करोड़ राम नाम के जाप का आदेश दिया था। इसके बाद उन्होंने सती अनुसुइया आश्रम में ब्रह्मऋषि परमहंस महाराज के सानिध्य में 11 वर्षों तक कठिन योग साधना की और अंततः धारकुंडी को अपनी कर्मस्थली बनाया।
पर्यटन और शांति का संगम
आज धारकुंडी आश्रम न केवल श्रद्धालुओं के लिए बल्कि प्रकृति प्रेमियों और इतिहास के जिज्ञासुओं के लिए भी एक पसंदीदा स्थल है। पहाड़ों से गिरती जलधारा (धार) और कुंड की शांत लहरें यहाँ आने वाले हर आगंतुक को मंत्रमुग्ध कर देती हैं।

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